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आदिवासी महिलाओं का आर्थिक एवं शैक्षणिक स्तर
(गुजरात के अमीरगढ़ तालुका के विशेष सन्दर्भ में)

संक्षिप्तांक

प्रख्यात समाजशात्री एवं विचारक मार्क्स का कहना है की “स्त्री का कोई वर्ग नही होता हैं, विश्व की आधी आबादी वर्ग विहीन हैं, स्त्री के वर्ग का निर्धारण पुरुष के वर्ग से होता हैं” l नारीवादी विचारक सिमोन द बुआ ने भी अपनी पुस्तक “The Second Sex” में बताया है की “नारी जन्मती नही, बनाई जाती हैं” l नारी की प्रकृति के रूप में और पुरुष को संस्कृति के रूप में चित्रित किया जाता रहा हैं l नारी की इस गिरी हुई हीन स्थिति के लिए पितृसतात्मकता की प्रथा उत्तरदायी हैंl प्रस्तुत अध्ययन आदिवासी स्त्रियो की सामाजिक एवं शैक्षणिक परिस्थितियों एवं आये हुए बदलावों को खोजने का प्रयास करेगा कि वर्तमान समय में उनके सामाजिक जीवन तथा शिक्षा के स्तर पर कितना बदलाव आ रहा हैं l जिस प्रकार आदिवासी समाज में शिक्षा का आगाज हुआ है आदिवासी महिलाओ में शिक्षा का स्तर कम मात्रा में पाया जाता है, उनकी आर्थिक स्थिति इतनी उच्च नही है की वे स्कूल या कोलेज में शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेज सकें l यहाँ कुछ मात्रा में आदिवासी लड़कियां प्राथमिक शिक्षा तो प्राप्त कर पाती है लेकिन आगे की पढाई नही कर पाती है या तो उनका कम उम्र में विवाह हो जाता है या तो सामाजिक बन्धनों के कारण तथा साधनों के अभाव में शिक्षा बीच में ही रोकनी पड़ती है जबकि सरकार आदिवासियो के विकास के लिए भारी मात्रा में नीतियां और कल्याणकारी योजनाये चला रही है, जिससे उनका समुचित और सर्वागीण विकास हो सके तथा वे बहिस्कृत समूह और उपान्त समूह से समाज की सामान्य धारा में सम्मिलित हो सकें l प्रस्तुत शोध पत्र प्राथमिक और द्रितीयक तथ्यो पर आधारित है l तथ्यों और घटनाओं को नारीवादी तथा समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य के आधार पर विश्लेषित करने का प्रयास किया गया है l इसकी प्रकृति वर्णनात्मक है l

मुख्य शब्द :- आदिवासी महिलाये, शिक्षा, आर्थिक स्तर, पिछाडापन, परीस्थितियाँ एवं बदलाव l

परिचय:-

जब हम सम्पूर्ण मानव समाज के विकास की बात करते हैं तो पाते हैं की दुनिया का आधा हिस्सा अब भी विकास के लाभ से वंचित है और उनकी गणना हासिये के समूह, पिछड़े वर्ग, वंचित वर्ग, बहिष्कृत समूह, अनुसूचित जाति तथा जनजाति और महिलाओ के रूप में की जाती है l सामान्यरूप में महिलाओ तथा विशेषरूप से आदिवासी औरतो को तीन तरह से मुसीबत का सामना करना पड़ता है, एक महिला, दूसरा आदिवासी, तीसरा ग्रामीण जीवन l हम औरतो के सशक्तिकरण की बात करते हैं जबकि नारी जाति को शक्ति का रूप माना जाता हैं तो ऐसा कहा जा सकता हैं की यह तो शक्ति के सशक्तिकरण की बात हैं जिसमे नारी के पास इतनी शक्ति नही है की वो एकता तथा सम्मान के साथ समाज में जीवन व्यतीत कर सकें l जिस तरह से भारत में सामान्यरूप से आदिवासियों का विकास तथा विशेषरूप से आदिवासी महिलाओ का विकास हो रहा हैं उससे यह परिलक्षित होता है की वे अपने विकास के प्रति जागरूक हो रहे हैं क्योकि भारत की प्राप्त जनगणना से यह पता चल रहा है की २००१ से २०११ के १० साल के अन्तराल में आदिवासी महिलाये शिक्षा के प्रति ज्यादा जागरूक हो रही है तथा उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति में भी सुधार हो रहा है l
जब हम आदिवासी जीवन की बात करते हैं तो ऐसा पाते है की आदिवासी सामाजिक स्तरीकरण में लिंग भेद का न तो कोई सार्वभौमिक नियम है और न ही सभी महत्वपूर्ण प्रस्थितियाँ लिंग भेद पर आधारित होती है l आदिवासी समाजों में हम महिलाओ की प्रस्थिति इस तथ्य से समझ सकते है की उन्हें सामाजिक सहभागिता के अवसर किस सीमा तक प्राप्त होते है, वैवाहिक निर्णय में उन्हें कितनी स्वतंत्रता प्राप्त है तथा आर्थिक क्रियाओं एवं शैक्षणिक जीवन में उनका कितना योगदान है l जैसा कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी स्त्री शिक्षा पर ज़ोर देते हुए कहते है की “महिलाओ का सशक्तिकरण तभी हो सकता है जब उनकों कार्य और अधिकारों का ज्ञान होगा और उसको प्राप्त करने कि शक्ति होगी l इसके लिए शिक्षा ही सबसे बड़ा हथियार है” l वर्तमान समय में सरकार पिछड़े हुए लोगों तथा महिलाओं में शिक्षा का स्तर उच्च करने और समानता लाने के लिए अथक प्रयास कर रही है l जगह–जगह स्कूल और कालेज की व्यवस्था करवा रही है ताकि सब शिक्षित हों और प्रगति के पथ पर अग्रसर हों क्योंकि शिक्षा ही वह हथियार है जिसके जरिये मनुष्य जाति का समुचित विकास हों सकता है, लेकिन क्या वास्तविकता में लोग शिक्षित हों रहे है? जिनको शिक्षा की ज्यादा जरूरत है वे आज भी इसके महत्व से अनभिज्ञ है l
आदिवासी शब्द दो शब्दों आदि और वासी से मिल कर बना है और इसका अर्थ मूल निवासी होता हैं l भारत की जनसख्या का एक बड़ा हिस्सा आदिवासियो का हैं l संविधान में आदिवासियो के लिए अनुसूचित जनजाति पद का प्रयोग किया गया हैं l महात्मा गाँधी ने आदिवासियो को गिरिजन (पहाड़ पर रहने वाले लोग) कह कर पुकारा हैं l आदिवासियो का रहन–सहन, रीति–रिवाज अपनी एक अलग विशेषता लिए हुए होते हैं, उनकी अपनी एक अलग संस्कृती होती हैं जो उन्हें दुसरे समाजो या लोगों से अलग करता हैं l उनकी पारिवारिक व्यवस्था, सामुदायिक जीवन, लग्न, व्यवसाय तथा उनके समाज में नारी की स्थिति और धार्मिक संगठन की भिन्न-भिन्न संरचना होती हैं जैसा की दुर्खीम ने आस्ट्रेलिया की अरुंटा जनजाति का अध्ययन करके पाया की उनमे धार्मिक रीति-रिवाज के कारण एकता की भावना तथा सामूहिक प्रतिनिधित्व पाया जाता हैं l गुजरात भारत का अत्यन्त महत्वपूर्ण राज्य हैं जो की भारत के पश्चिम भाग में स्थित हैं l गुजरात में अन्य जातियो के अलावा २००१ की जनगणना के अनुसार २५ आदिवासी जातियाँ पायी जाती हैं जिनमे वाल्मीकि, कोली, डगला, नायाका व मच्छि-खारवा जनजातिया आदि हैं l अगर गुजरात की कुल जनसख्या की दृष्टी से देखे तो १४.७९% आदिवासी लोग पाए जाते है l प्रस्तुत अध्ययन में गुजरात राज्य के अमीरगढ़ क्षेत्र में आदिवासी महिलाओं की स्थिति पर प्रकाश डाला गया है l अमीरगढ़ तालुका शैक्षणिक स्थिति में कुल साक्षरता दर 35.63% है जिसमे स्त्री साक्षरता दर 21.09% और पुरुष साक्षरता दर 49.26% और आदिवासी महिला साक्षरता दर 18% है l इस रेश्यो को देखकर यह समझा जा सकता है की इस तालुका में आदिवासी महिलाओ की शैक्षणिक स्थिति कितनी पिछड़ी है l उनसे सीधे रूबरू होने पर यह बात सामने आया की उनको शिक्षा की उपयोगिता के बारे में ज्यादा पता नही है उनका ऐसा मानना है की उनकी जीवनचर्या तो सही से चल रहा है तो वो अपने परिवार को शिक्षित करके क्या करेगे और जहाँ तक बात महिलाओ की है उनको तो शिक्षा की जरुरत ही नही है, ऐसा उनका मानना है l विभिन्न जनजातियों में लोग अपने लड़कों को विद्यालयों में और बाद में महाविद्यालयों में भेज रहे हैं l लेकिन, लड़कियों को भेजने के मामले में उतना उत्साह नहीं है l जनजातीय महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए जो भी रूपरेखा बनाई जाए, उसमें इस बात को अवश्य ध्यान में रखा जाए कि इन महिलाओं को भी नवयुग का सामना करना है l यहां रूढ़ियों और पंरम्पराओं में अंतर करना होगा l पंरम्पराएं एक पीढ़ी के बाद दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होनी चाहिएं किंतु रूढ़ियों के मामले में ऐसा नहीं होना चाहिए l अगर लडकियों को शिक्षा प्राप्ति के लिए भेज भी रहे है तो उन्हें बीच में ही पढाई छोड़ने के लिए मजबूर भी कर कर रहे है जिसकी वजह से उनकी पढाई पूरी नही हो पाती हैं l इसके पीछे छिपे वजह का पता लगाने पर कुछ कारणों का पता चला जैसे की यहाँ स्त्री साक्षरता दर निम्न होने का कारण आदिवासी विस्तार, भौगोलिक परिस्थिति, ग़रीबी, अज्ञानता, जागरूकता की कमी आदि है l इसलिए गुजरात सरकार कुछ चुने हुए क्षेत्रो में प्राथमिक शिक्षण कार्यक्रम और सर्व शिक्षा अभियान चला रहीं है जिससे इस क्षेत्र के लोगों में भी जागरुकता बढ़ रही है और शैक्षणिक स्थिति में क्रमशः सुधार हो रहा है l आगे इस अध्ययन के अंतर्गत आदिवासियों की आर्थिक स्थिति पर प्रकाश डालते हुए ज्ञात हुआ की इस क्षेत्र के आदिवासियों के आर्थिक जीवन का स्त्रोत जंगली लकड़ियाँ, फल-फूल, सब्जियाँ, पशु-पालन, गुंदर, दूध, दूसरो के खेतो में मज़दूरी तथा कृषि है l इसके अलावा हस्त निर्मित वस्तुए है जिसे वे बाजारों में बेच कर अपना जीवन निर्वाह करते है l यह अध्ययन मुख्य रूप से आदिवासी महिलाओं के आर्थिक निर्भरता का विश्लेषण करता है की आर्थिक आधारों पर वह कितनी मात्रा में भेदभाव की शिकार होती है तथा पिछड़ी हुई अवस्था में है l जैसा की शिक्षण और आर्थिक जीवन में सामानांतर सम्बन्ध होता है तो यह कहा जा सकता है की जिनका शैक्षणिक जीवन उच्च होगा तो उनका आर्थिक जीवन समृद्ध होगा l

निष्कर्ष:-
वर्तमान में आदिवासियो के सामने जीवन निर्वाह की समस्या दिनोदिन बढ़ती जा रही हैं, जिसकी वजह से शिक्षा की उपयोगिता के बारे में अभी तक उनमे पूर्णतया जागरूकता नही आ पाई और ना ही प्राथमिकता बन पाई है, विशेषरूप से स्त्री शिक्षा के बारे में l पुरुष द्वारा कर्ज लेने की प्रवृत्ति के कारण भी महिलाओं की स्थिति पर विपरीत प्रभाव पड़ता है l उन्हें भी परिवार के अन्य सदस्यों के साथ बंधुआ मजदूरी करने के लिए मजबूर होना पड़ता है l शिक्षा में प्रगति हुई है तो यह कहा जा सकता है की इस तालुका में आदिवासियो में विशेषतया महिलाओं में शिक्षा की कितनी ज्यादा आवश्यकता हैं l यहाँ पर शिक्षा की कमी का कारण लोगों में जागरूकता का आभाव तथा शिक्षा के महत्व से अनभिज्ञता हैं l जहां तक आदिवासी स्त्रियों में शिक्षा प्राप्ति की बात है तो उनके समुदाय में उनको शिक्षा प्राप्ति के लिए प्रोत्साहित नही किया जाता है, जबकि आने वाले समय में अगर वे शिक्षित होती है तो उनके समाज में नया आयाम लाया जा सकता है जैसा की स्वामी विवेकानंद का मानना है की अगर स्त्री शिक्षित होती है तो पूरा समाज शिक्षित होगा, परन्तु इस तालुका से प्राप्त आकंडो से यही प्रतीत होता है की आदिवासी स्त्रियाँ शिक्षा के क्षेत्र में बहुत पिछड़ी हुई अवस्था में है और जैसा की शिक्षा तथा आर्थिक जीवन का सामान्तर सम्बन्ध होता है तो बिना उचित तथा वैल्युएबल शिक्षा के आर्थिक समृधता भी प्राप्त नही की जा सकती हैं l वर्तमान समय में जिस तरह से उपभोक्तावाद, पूंजीवाद समाज में समानता, बाजारीकरण, वैश्विकरण सम्पूर्ण समाज में व्याप्त हो रहा है, और जैसा की प्रसिद्ध दर्शनशास्त्री, समाजशास्त्री ‘माइकल फोकाल्ट’ का मानना है की ज्ञान ही शक्ति है, जिसके पास ज्ञान है उसके पास शासन करने की शक्ति है तो ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है की आने वाले समय में जिसके पास ज्ञान होगा उसके पास समृधता होगी l आधुनिक समाज की इस अंधाधुंध दौड़ में खासतौर पर आदिवासी महिलाओ को शिक्षा तथा अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होने की आवश्कता है जिससे वे समाज में समानता और सम्मान के साथ जीवन व्यतीत कर सके और आने वाले समाज का पुनर्निर्माण कर सकें |

संदर्भ ग्रन्थ सूची:-



  1. Tribal Profile at a Glance May 2013. CENSUS OF INDIA 2011, CHANDRAMOULI C., Ministry Of Home Affairs, 03 May 2013, As revealed in Census 2011
  2. Tribal Women Development and Integration (1993), K. Mann, Department of Anthropology, University of Delhi.
  3. Gujarat, Data Highlights: The Schedule Tribes, Census of India 2001.
  4. Status of Tribal Women, Bhasin ,Veena, Department of Anthropology, University of Delhi, India
  5. .
  6. विकिपीडिया, आदिवासी, नवम्बर 2013, समय,03:40.
  7. क्या महिलाओ की स्थिति और स्वतन्त्रता में आज भी सुधार एक भ्रम?, 25सितम्बर 2011.


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गुंजन मिश्रा
समाजशास्त्र विभाग,
लेक्चरर, गवर्नमेंट आर्ट्स कॉलेज
अमीरगढ़ ,(गुजरात)

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